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वन पर्व
अध्याय २९३
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वैशम्पाय़न उवाच
सदा हि तस्य स्पर्धासीदर्जुनेन विशां पते |  १९   क
अर्जुनस्य च कर्णेन यतो दृष्टो वभूव सः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति