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शान्ति पर्व
अध्याय २९४
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वसिष्ठ उवाच
इन्द्रिय़ाणीन्द्रिय़ार्थेभ्यो निवर्त्य मनसा मुनिः |  १०   क
दशद्वादशभिर्वापि चतुर्विंशात्परं ततः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति