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शान्ति पर्व
अध्याय २९४
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वसिष्ठ उवाच
विमुक्तः सर्वसङ्गेभ्यो लघ्वाहारो जितेन्द्रिय़ः |  १३   क
पूर्वरात्रे परे चैव धारय़ेत मनोऽऽत्मनि ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति