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शान्ति पर्व
अध्याय २९४
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वसिष्ठ उवाच
स्थिरीकृत्येन्द्रिय़ग्रामं मनसा मिथिलेश्वर |  १४   क
मनो वुद्ध्या स्थिरं कृत्वा पाषाण इव निश्चलः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति