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शान्ति पर्व
अध्याय २९४
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वसिष्ठ उवाच
न शृणोति न चाघ्राति न रस्यति न पश्यति |  १६   क
न च स्पर्शं विजानाति न सङ्कल्पय़ते मनः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति