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शान्ति पर्व
अध्याय २९४
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वसिष्ठ उवाच
अन्यदेव च क्षेत्रं स्यादन्यः क्षेत्रज्ञ उच्यते |  ३८   क
क्षेत्रमव्यक्तमित्युक्तं ज्ञाता वै पञ्चविंशकः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति