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शान्ति पर्व
अध्याय २९४
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वसिष्ठ उवाच
सर्वमेतद्विजानन्तो न सर्वस्य प्रवोधनात् |  ४८   क
व्यक्तीभूता भविष्यन्ति व्यक्तस्य वशवर्तिनः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति