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शान्ति पर्व
अध्याय २९४
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करालजनक उवाच
विद्याविद्ये च भगवन्नक्षरं क्षरमेव च |  ५   क
साङ्ख्यं योगं च कार्त्स्न्येन पृथक्चैवापृथक्च ह ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति