वन पर्व  अध्याय २९४

वैशम्पाय़न उवाच

तस्माद्विनिमय़ं कृत्वा कुण्डले वर्म चोत्तमम् |  १७   क
हरस्व शक्र कामं मे न दद्यामहमन्यथा ||  १७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति