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वन पर्व
अध्याय २९४
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वैशम्पाय़न उवाच
सेय़ं तव करं प्राप्य हत्वैकं रिपुमूर्जितम् |  २५   क
गर्जन्तं प्रतपन्तं च मामेवैष्यति सूतज ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति