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वन पर्व
अध्याय २९४
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कर्ण उवाच
एकमेवाहमिच्छामि रिपुं हन्तुं महाहवे |  २६   क
गर्जन्तं प्रतपन्तं च यतो मम भय़ं भवेत् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति