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वन पर्व
अध्याय २९४
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इन्द्र उवाच
एकं हनिष्यसि रिपुं गर्जन्तं वलिनं रणे |  २७   क
त्वं तु यं प्रार्थय़स्येकं रक्ष्यते स महात्मना ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति