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वन पर्व
अध्याय २९४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो देवा मानवा दानवाश्च; निकृन्तन्तं कर्णमात्मानमेवम् |  ३६   क
दृष्ट्वा सर्वे सिद्धसङ्घाश्च नेदु; र्न ह्यस्यासीद्दुःखजो वै विकारः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति