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वन पर्व
अध्याय २९४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो दिव्या दुन्दुभय़ः प्रणेदुः; पपातोच्चैः पुष्पवर्षं च दिव्यम् |  ३७   क
दृष्ट्वा कर्णं शस्त्रसङ्कृत्तगात्रं; मुहुश्चापि स्मय़मानं नृवीरम् ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति