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वन पर्व
अध्याय २९४
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वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा कर्णं मुषितं धार्तराष्ट्रा; दीनाः सर्वे भग्नदर्पा इवासन् |  ४०   क
तां चावस्थां गमितं सूतपुत्रं; श्रुत्वा पार्था जहृषुः काननस्थाः ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति