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वन पर्व
अध्याय २९४
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व्राह्मण उवाच
एतदिच्छाम्यहं क्षिप्रं त्वय़ा दत्तं परन्तप |  ५   क
एष मे सर्वलाभानां लाभः परमको मतः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति