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शान्ति पर्व
अध्याय २९५
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वसिष्ठ उवाच
अविद्यामाहुरव्यक्तं सर्गप्रलय़धर्मि वै |  २   क
सर्गप्रलय़निर्मुक्तं विद्यां वै पञ्चविंशकम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति