शान्ति पर्व  अध्याय २९५

वसिष्ठ उवाच

तदैषोऽन्यत्वतामेति न च मिश्रत्वमाव्रजेत् |  २१   क
प्रकृत्या चैव राजेन्द्र नमिश्रोऽन्यश्च दृश्यते ||  २१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति