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शान्ति पर्व
अध्याय २९५
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वसिष्ठ उवाच
किं मय़ा कृतमेतावद्योऽहं कालमिमं जनम् |  २३   क
मत्स्यो जालं ह्यविज्ञानादनुवर्तितवांस्तथा ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति