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शान्ति पर्व
अध्याय २९५
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वसिष्ठ उवाच
ततोऽस्मि वहुरूपासु स्थितो मूर्तिष्वमूर्तिमान् |  ३४   क
अमूर्तश्चापि मूर्तात्मा ममत्वेन प्रधर्षितः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति