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शान्ति पर्व
अध्याय २९५
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वसिष्ठ उवाच
निःसन्दिग्धं च सूक्ष्मं च विवुद्धं विमलं तथा |  ४१   क
प्रवक्ष्यामि तु ते भूय़स्तन्निवोध यथाश्रुतम् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति