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शान्ति पर्व
अध्याय २९५
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वसिष्ठ उवाच
प्रवोधनकरं ज्ञानं साङ्ख्यानामवनीपते |  ४३   क
विस्पष्टं प्रोच्यते तत्र शिष्याणां हितकाम्यया ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति