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वन पर्व
अध्याय २९५
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वैशम्पाय़न उवाच
तेषां प्रय़तमानानां नादृश्यत महामृगः |  १४   क
अपश्यन्तो मृगं श्रान्ता दुःखं प्राप्ता मनस्विनः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति