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वन पर्व
अध्याय २९५
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं हृताय़ां कृष्णाय़ां प्राप्य क्लेशमनुत्तमम् |  २   क
विहाय़ काम्यकं राजा सह भ्रातृभिरच्युतः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति