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द्रोण पर्व
अध्याय १३९
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धृतराष्ट्र उवाच
अव्यग्रानेव हि परान्कथय़स्यपराजितान् |  १५   क
हतांश्चैव विषण्णांश्च विप्रकीर्णांश्च शंससि |  १५   ख
रथिनो विरथांश्चैव कृतान्युद्धेषु मामकान् ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति