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शान्ति पर्व
अध्याय २९६
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वसिष्ठ उवाच
अजस्रं त्विह क्रीडार्थं विकुर्वन्ती नराधिप |  २   क
आत्मानं वहुधा कृत्वा तान्येव च विचक्षते ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति