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शान्ति पर्व
अध्याय २९६
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वसिष्ठ उवाच
निःसङ्गात्मानमासाद्य षड्विंशकमजं विदुः |  २०   क
विभुस्त्यजति चाव्यक्तं यदा त्वेतद्विवुध्यते |  २०   ख
चतुर्विंशमगाधं च षड्विंशस्य प्रवोधनात् ||  २०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति