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शान्ति पर्व
अध्याय २९६
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वसिष्ठ उवाच
शुचिकर्मा शुचिश्चैव भवत्यमितदीप्तिमान् |  २८   क
विमलात्मा च भवति समेत्य विमलात्मना ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति