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शान्ति पर्व
अध्याय २९६
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वसिष्ठ उवाच
न वेदनिष्ठस्य जनस्य राज; न्प्रदेय़मेतत्परमं त्वय़ा भवेत् |  ३१   क
विवित्समानाय़ विवोधकारकं; प्रवोधहेतोः प्रणतस्य शासनम् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति