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शान्ति पर्व
अध्याय २९६
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वसिष्ठ उवाच
न देय़मेतच्च तथानृतात्मने; शठाय़ क्लीवाय़ न जिह्मवुद्धय़े |  ३२   क
न पण्डितज्ञानपरोपतापिने; देय़ं त्वय़ेदं विनिवोध यादृशे ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति