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शान्ति पर्व
अध्याय २९६
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वसिष्ठ उवाच
विविक्तशीलाय़ विधिप्रिय़ाय़; विवादहीनाय़ वहुश्रुताय़ |  ३४   क
विजानते चैव न चाहितक्षमे; दमे च शक्ताय़ शमे च देहिनाम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति