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आदि पर्व
अध्याय १२३
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वैशम्पाय़न उवाच
पूजय़ित्वा ततो द्रोणं विधिवत्स निषादजः |  ३२   क
निवेद्य शिष्यमात्मानं तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति