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शान्ति पर्व
अध्याय २९६
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वसिष्ठ उवाच
अव्यक्तं न तु तद्व्रह्म वुध्यते तात केवलम् |  ९   क
केवलं पञ्चविंशं च चतुर्विंशं न पश्यति ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति