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वन पर्व
अध्याय १३२
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लोमश उवाच
ततो वर्षे द्वादशे श्वेतकेतु; रष्टावक्रं पितुरङ्के निसन्नम् |  १६   क
अपाकर्षद्गृह्य पाणौ रुदन्तं; नाय़ं तवाङ्कः पितुरित्युक्तवांश्च ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति