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वन पर्व
अध्याय २९६
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वैशम्पाय़न उवाच
अनादृत्य तु तद्वाक्यं सहदेवः पिपासितः |  १९   क
अपिवच्छीतलं तोय़ं पीत्वा च निपपात ह ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति