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वन पर्व
अध्याय २९६
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रसुप्ताविव तौ दृष्ट्वा नरसिंहः सुदुःखितः |  २३   क
धनुरुद्यम्य कौन्तेय़ो व्यलोकय़त तद्वनम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति