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वन पर्व
अध्याय २९६
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वैशम्पाय़न उवाच
नापश्यत्तत्र किञ्चित्स भूतं तस्मिन्महावने |  २४   क
सव्यसाची ततः श्रान्तः पानीय़ं सोऽभ्यधावत ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति