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वन पर्व
अध्याय २९६
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वैशम्पाय़न उवाच
अपेतजननिर्घोषं प्रविवेश महावनम् |  ४०   क
रुरुभिश्च वराहैश्च पक्षिभिश्च निषेवितम् ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति