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वन पर्व
अध्याय २९६
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वैशम्पाय़न उवाच
उपेतं नलिनीजालैः सिन्धुवारैश्च वेतसैः |  ४३   क
केतकैः करवीरैश्च पिप्पलैश्चैव संवृतम् |  ४३   ख
श्रमार्तस्तदुपागम्य सरो दृष्ट्वाथ विस्मितः ||  ४३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति