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शान्ति पर्व
अध्याय २९७
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भीष्म उवाच
विरिक्तस्य यथा सम्यग्घृतं भवति भेषजम् |  १८   क
तथा निर्हृतदोषस्य प्रेत्यधर्मः सुखावहः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति