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वन पर्व
अध्याय २९७
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यक्ष उवाच
किं स्विदेको विचरति जातः को जाय़ते पुनः |  ४६   क
किं स्विद्धिमस्य भैषज्यं किं स्विदावपनं महत् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति