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वन पर्व
अध्याय २९७
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यक्ष उवाच
कश्च धर्मः परो लोके कश्च धर्मः सदाफलः |  ५४   क
किं निय़म्य न शोचन्ति कैश्च सन्धिर्न जीर्यते ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति