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वन पर्व
अध्याय २९७
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यक्ष उवाच
किं नु हित्वा प्रिय़ो भवति किं नु हित्वा न शोचति |  ५६   क
किं नु हित्वार्थवान्भवति किं नु हित्वा सुखी भवेत् ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति