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वन पर्व
अध्याय २९७
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युधिष्ठिर उवाच
दिवं स्पृशति भूमिं च शव्दः पुण्यस्य कर्मणः |  ६३   क
यावत्स शव्दो भवति तावत्पुरुष उच्यते ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति