वन पर्व  अध्याय २९७

यक्ष उवाच

व्याख्यातः पुरुषो राजन्यश्च सर्वधनी नरः |  ६५   क
तस्मात्तवैको भ्रातॄणां यमिच्छसि स जीवतु ||  ६५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति