आदि पर्व  अध्याय ५८

वैशम्पाय़न उवाच

एवं कृतय़ुगे सम्यग्वर्तमाने तदा नृप |  २४   क
आपूर्यत मही कृत्स्ना प्राणिभिर्वहुभिर्भृशम् ||  २४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति