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द्रोण पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
त्वरते मे मतिस्तात त्वय़ि युद्धाभिकाङ्क्षिणि |  १८   क
नाहत्वा संनिवर्तिष्ये त्वामद्य पुरुषाधम ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति