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शान्ति पर्व
अध्याय २९८
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याज्ञवल्क्य उवाच
अहङ्काराच्च सम्भूतं मनो भूतगुणात्मकम् |  १८   क
तृतीय़ः सर्ग इत्येष आहङ्कारिक उच्यते ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति