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शल्य पर्व
अध्याय ५१
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वैशम्पाय़न उवाच
ऋषिरासीन्महावीर्यः कुणिर्गार्ग्यो महाय़शाः |  ३   क
स तप्त्वा विपुलं राजंस्तपो वै तपतां वरः |  ३   ख
मानसीं स सुतां सुभ्रूं समुत्पादितवान्विभुः ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति