वन पर्व  अध्याय २९८

यक्ष उवाच

वरं वृणीष्व राजेन्द्र दाता ह्यस्मि तवानघ |  ११   क
ये हि मे पुरुषा भक्ता न तेषामस्ति दुर्गतिः ||  ११   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति